आनंद वो अवस्था हो सकती है जिसमें जाकर हम स्वयं को एक पूर्णता और संतुष्ट अवस्था में पाएं। पूर्णता को शास्त्रों में जीवन का लक्ष्य बताया गया है। ये पूर्णता स्थूल रूप में तो हमें अपनी-अपनी सोच के अनुसार मिलता है पर सूक्ष्म रूप से ये आपस में जुड़ा हुआ है। अगर देखा जाये तो यही आनंद की प्राप्ति मनुष्य के लिये सार्थकता है। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि आनंद ही ब्रम्हा है। आनंद भी अपने-अपने विचार के अनुसार भिन्न-भिन्न है। माध्यम जो किसी के लिये आनंद का हेतु हो सकता है वही किसी दूसरे के लिये समय का व्यर्थ विसर्जन है।
Wednesday, 7 December 2016
दिन की सार्थकता क्या है?
सूर्य उदित होता है और डूब जाता है। अपने साथ पूरा दिन ले जाता है क्या कभी सोचा है कि क्या कुछ ले जाता है? एक पूरा दिन......ये जो दिन गया अब कभी वापस नहीं मिलेगा...ये सांसे जो आज चली गईं फिर नहीं मिलेंगी।
एक पूरा दिन हमारे जीवन का समाप्त हो गया...यूं ही दिन पर दिन, सप्ताह पर सप्ताह, महीनों पर महीनों, सालों पर सालों बीत जाएंगे और एक दिन...
क्या कभी सोचा है कि एक दिन को सार्थक कैसे बनाया जा सकता है? क्या कुछ किया जाए कि ये जो दिन गया इसकी उपयोगिता सिद्ध हो जाए...
मित्रों अपने-अपने हिसाब से हमारी सोच इस दिन को सार्थक बनाने के बारे में सोच सकती है। अपने-अपने हिसाब से इस दिन की सार्थकता को हम सिद्ध कर सकते हैं।
अब सवाल है कि सिद्ध का अर्थ क्या हो सकता है? सिद्ध यानी उपयोगिता..एक दिन की उपयोगिता क्या हो सकती है? ये सवाल तो सुलझने के बजाये उलझता ही जा रहा है। उपयोगिता से सूक्ष्म रूप से कही संबद्ध है आनंद, जिसकी अनुभूति ही दिन की सार्थकता को सिद्ध कर सकती है।
भविष्य में जब हम चिंतन करेंगे तो हम पायेंगे कि इस दिन से हमने कुछ पाया है ये प्राप्ति ही आनंद की अनुभूति को दृढता प्रदान करेगी। ये क्या सवाल तो वही रहा कलेवर बदल गया, अब आनंद क्या है?
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